बैंक का दौरा (लघु कथा)
बैंक का दौरा हमेशा सूचनात्मक होता है। बैंकिंग संस्था वर्तमान आर्थिक व्यवस्था का एक अभिन्न अंग होता है।मुझे भी कोविड द्वितीय लहर के दौरान लोक डाउन की शिथिलता के दौरान घर की आर्थिक व्यवस्था का इंतजाम करने के लिए बैंक का दौरा करने की योजना बनाई ही थी कि पड़ोसी बनिया जो अन्य सभी से फायदा उठाने के लिए कुख्यात था ,उसने मुझे बैंक का अपना काम सौंप दिया ।
आर्थिक जरूरतों और उद्देश्यों को पूरा करने के उद्देश्य से संसाधनों का चैनलाइजेशन और एकाग्रता, वह सिद्धांत है जिस पर एक बैंक संचालित होता है,शायद दोस्ती भी ,उसके कुटिल मुस्कान युक्त अनुरोध को मैं टाल न सका ,उसके दिए पच्चीस हजार रुपयों को किसी तरह संभालता हुआ बैंक की और बढ़ चला ।
बैंक में बहुत भीड़ थी दो घंटे बाद मेरी बारी आई ,उस पड़ोसी बनिए के रुपये जैसे ही जमा कर पलटा उसी समय उसका फोन आ गया कि यदि मुझे तकलीफ हो रही है तो क्या उसे आना चाहिए ?मेरा माथा सनकते रह गया और शांत होकर जबाब दिया हां भीड़ बहुत है यदि आ सके तो ठीक रहेगा ।
मुझे पता था कि यदि वह जल्दी भी करेगा तो बीस मिनट से पहले नहीं आ सकता है इसलिए तसल्ली से अपना काम निबटाया ,जैसे ही मैं बैंक से बाहर आने लगा देखा वह दौड़ता हुआ आ रहा था ,मैंने उसकी ओर जमा पर्ची बड़ाई ,पर माई के लाल ने आश्चर्य से मुझे तो देखा पर धन्यवाद तक नहीं कहा ।
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